तुम देना साथ मेरा

तुम देना साथ मेरा

Thursday, 13 December 2012

अर्जी छुट्टी की..........संतोष सुपेकर










छुट्टी की अर्जी,
केवल एक कागज
या दस्तावेज
ही नहीं....

एक भावना है..
एक आशा है
उम्मीद है...और
हक भी है

एक धमकी है..
बहाना है.... और
सपना भी है

सपना, जो टूटता भी है कभी
जब होती है खारिज अर्जी
और लिखा मिलता है उसपर
अस्वीकृत..

मुस्कुराते हुए बॉस की मर्जी

और...एक और छुट्टी की अर्जी
जो हरदम स्वीकृत ही होती है
इस घोर कलियुग में भी
मानवतता यहाँ नही सोती है

वह अर्जी है...
माँ की बीमारी की वजह से
माँगी गई छुट्टी
अक्सर उस 'बीमार' माँ के लिये
जो मर चुकी है,
कई वर्ष पूर्व गाँव मे..

--संतोष सुपेकर
--संपादनः यशोदा अग्रवाल

Thursday, 30 August 2012

हमारी याद आएगी...........रचनाकार :: अज्ञात

किसी से चोट खाओगे

हमारी याद आएगी,

तलाशोगे एक कतरा प्यार का,

किसी से कह न पाओगे,

तलाशोगे मुझे फिर तुम,

दिलों की तनहाइयों में,

कभी जब तनहा बैठोगे,

हमारी याद आएगी.

लौटा हूँ बहुत मायूस होकर

मैं तेरे दर से,

कभी खामोश बैठोगे

हमारी याद आएगी

समेट लेता सारे अश्क

तेरी आँखों की कोरों से,

कभी जब अश्क देखोगे

हमारी याद आएगी...!! 

रचनाकार:: अज्ञात 

प्रस्तुतिकरण :: सोनू अग्रवाल

Monday, 20 August 2012

पिछले पन्नों में‍ लिखी जाने वाली कविता......तिथि दानी

अक्सर पिछले पन्नों में ही
लिखी जाती है कोई कविता
फिर ढूंढती है अपने लिए
एक अदद जगह
उपहारस्वरूप दी गई
किसी डायरी में
फिर किसी की जुबां में
फिर किसी नामचीन पत्रिका में

फिर भी न जाने क्यों
भटकती फिरती है ये मुसाफिर
खुद को पाती है एकदम प्यासा
अचानक इस रेगिस्तान में
उठते बवंडर संग उड़ चलती हैं ये
बवंडर थककर खत्म कर देता है
अपना सफर
लेकिन ये उड़ती जाती हैं
और फैला देती है
अपना एक-एक कतरा
उस अनंत में जो रहस्यमयी है।
लेकिन एक खास बात
इसके बारे में,
आगोश से इसके चीजें
गायब नहीं होतीं
और न ही होती है
इनकी इससे अलग पहचान

लेकिन यह कविता
शायद! अपने जीवनकाल में
सबसे ज्यादा खुश होती है
यहां तक पहुंचकर
क्योंकि
ब्रह्माण्ड के नाम से जानते हैं
हम सब इसे।





-तिथि दानी

Thursday, 19 July 2012

दिन सावन के...................विनोद रायसरा

दिन सावन के
तरसावन के


कौंधे बिजली
यादें उजली
अंगड़ाई ले
सांझें मचली

आते सपने
मन भावन के...

चलती पछुआ
बचते बिछिआ
सिमटे-सहमें
मन का कछुआ

हरियाए तन
सब घावन के

नदिया उमड़ी
सुधियां घुमड़ी
लागी काटन
हंसुली रखड़ी

छाये बदरा
तर-सावन के..

बरसे बदरा
रिसता कजरा
बांधूं कैसे
पहुंची गजरा

बैरी दिन हैं
दुख पावन के...

मीठे सपने
कब है अपने
चकुआ मन का
लगता जपने

कितने दिन हैं
पिऊ आवन के..


--विनोद रायसरा

Tuesday, 10 July 2012

तुम्हारी पलकों की कोर पर...........''फाल्गुनी''

कुछ मत कहना तुम
मैं जानती हूँ
मेरे जाने के बाद
वह जो तुम्हारी पलकों की कोर पर
रुका हुआ है
चमकीला मोती
टूटकर बिखर जाएगा
गालों पर
और तुम घंटों अपनी खिड़की से
दूर आकाश को निहारोगे
समेटना चाहोगे
पानी के पारदर्शी मोती को,
देर तक बसी रहेगी
तुम्हारी आँखों में
मेरी परेशान छवि
और फिर लिखोगे तुम कोई कविता
फाड़कर फेंक देने के लिए...
जब फेंकोगे उस
उस लिखी-अनलिखी
कविता की पुर्जियाँ,
तब नहीं गिरेगी वह
ऊपर से नीचे जमीन पर
बल्कि गिरेगी
तुम्हारी मन-धरा पर
बनकर काँच की कि‍र्चियाँ...
चुभेगी देर तक तुम्हें
लॉन के गुलमोहर की नर्म पत्तियाँ।


----स्मृति जोशी ''फाल्गुनी''

Tuesday, 29 May 2012

मौसम और मन .....यशवन्त माथुर

मेरे ब्लाग धरोहर की सौवीं पोस्ट.........
मौसम और मन...भाई यशवन्त माथुर
कभी धूप
कभी छाँव

कभी गर्मी

कभी ठंड

कभी बरसात

कभी बसंत

बदलता है मौसम

पल पल रंग।


मन भी तो ऐसा ही है

बिलकुल मौसम जैसा

पल पल बदलता हुआ

कभी अनुराग रखता है

प्रेम मे पिघलता है

और कभी

जलता है

द्वेष की गर्मी मे।


ठंड मे ठिठुरता है

किटकिटाता है

क्या हो रहा है-

सही या गलत

समझ नहीं पाता है

जम सा जाता है मन

पानी के ऊपर तैरती

बरफ की सिल्ली की तरह ।


मन!

जब बरसता है

बेहिसाब बरसता ही

चला जाता है

बे परवाह हो कर

अपनी सोच मे

अपने विचारों मे

खुद तो भीगता ही है

सबको भिगोता भी है

जैसे पहले से ही

निश्चय कर के निकला हो

बिना छाते के घर से बाहर ।


बसंत जैसा मन !

हर पल खुशनुमा सा

एक अलग ही एहसास लिये

कुछ कहता है

अपने मन की बातें करता है

मंद हवा मे झूमता है

इठलाता है

खेतों मे मुसकुराते

सरसों के फूलों मे

जैसे देख रहा हो

अपना अक्स।


मौसम और मन

कितनी समानता है

एकरूपता है

भूकंप के जैसी

सुनामियों के जैसी

ज्वालामुखियों के जैसी

और कभी

बिलकुल शांत

आराम की मुद्रा मे

लेटी हुई धरती के जैसी
। 
--यशवन्त माथुर
http://jomeramankahe.blogspot.com
http://nayi-purani-halchal.blogsppot.com
http://yashwantrajbalimathur.blogspot.com

तू हर मौसम को सहनेवाली एक नदी......डॉ.कुँअर बेचैन






पत्नी

तू मेरे घर में बहनेवाली एक नदी


मैं नाव

जिसे रहना हर दिन


बाहर के रेगिस्तानों में।


नन्हीं बेसुध लहरों को तू


अपने आँचल में पाल रही


उनको तट तक लाने को ही


तू अपना नीर उछाल रही


तू हर मौसम को सहनेवाली एक नदी


मैं एक देह


जो खड़ी रही आँधी, वर्षा, तूफ़ानों में।


इन गर्म दिनों के मौसम में


कितनी कृश कितनी क्षीण हुई।


उजली कपास-सा चेहरा भी


हो गया कि जैसे जली रुई


तू धूप-आग में रहनेवाली एक नदी


मैं काठ


सूखना है जिसको


इन धूल भरे दालानों में।


तेरी लहरों पर बहने को ही


मुझे बनाया कर्मिक ने


पर तेरे-मेरे बीच रेख-


खींची रोटी की, मालिक ने


तू चंद्र-बिंदु के गहनेवाली एक नदी


मैं सम्मोहन


जो टूट गया


बिखरा फिर नई थकानों में। 
 
--डॉ.कुँअर बेचैन
प्रस्तुतिकरणः अमोल पाराशर

सिर्फ़ तन्हाईयों ने बुलाया हमें......राकेश खण्डेलवाल


रेत पर नाम लिख लिख मिटाते सभी,
तुमने पत्थर पे लिख कर मिटाया हमें
शुक्रिया, मेहरबानी करम, देखिये
एक पल ही सही गुनगुनाया हमें

तुम शनासा थे दैरीना कल शाम को,
बेरुखी ओढ़ कर फिर भी हमसे मिले
हमको तुमसे शिकायत नहीं है कोई,
अपनी परछाईं ने भी भूलाया हमें

आये हम बज़्म में सोच कर सुन सकें
चंद ग़ज़लें तुम्हारी औ’ अशआर कुछ
हर कलामे सुखन बज़्म में जो पढ़ा
वो हमारा था तुमने सुनाया हमें

ध्यान अपना लगा कर थे बैठे हुए,
भूल से ही सही कोई आवाज़ दे
आई लेकर सदा न इधर को सबा,
सिर्फ़ तन्हाईयों ने बुलाया हमें

ढाई अक्षर का समझे नहीं फ़लसफ़ा,
ओढ़ कर जीस्त की हमने चादर पढ़ा
एक गुलपोश तड़पन मिली राह में
जिसने बढ़ कर गले से लगाया हमें

तुमने लहरा के सावन की अपनी घटा
भेजे पैगाम किसको, ये किसको पता
ख़्‍वाब में भी न आया हमारे कोई
तल्खियों ने थपक कर सुलाया हमें... 
-राकेश खण्डेलवाल

Sunday, 13 May 2012

ओ मेरी माँ वो तू ही है..........दीप्ति शर्मा

जब पहला आखर सीखा मैंने
लिखा बड़ी ही उत्सुकता से 

हाथ पकड़ लिखना सिखलाया
ओ मेरी माँ वो तू ही है ।

अँगुली पकड़ चलना सिखलाया

चाल चलन का भेद बताया
संस्कारों का दीप जलाया
ओ मेरी माँ वो तू ही है ।

जब मैं रोती तो तू भी रो जाती

साथ में मेरे हँसती और हँसाती
मुझे दुनिया का पाठ सिखाती
ओ मेरी माँ वो तू ही है ।

खुद भूखा रह मुझे खिलाया

रात भर जगकर मुझे सुलाया
हालातों से लड़ना तूने सिखाया
ओ मेरी माँ वो तू ही है ।

© दीप्ति शर्मा

Sunday, 6 May 2012

मरीचिका ......................अनन्या अंजू

वह दृष्टि
अब भी
मुझमे है......!
उसमे डूबी
लड़ रही हूं
मैं ,स्वयं  से !
क्या ..
भ्रम है वो मेरा
या फिर
है मरूभूमि में
जल  का आभास ....!!
छोड़ दूँ खोज
किसी डर से
या दौड लूँ ,उस
परछाई के पीछे .....!
जिज्ञासावश  देखा
फिर से उन आँखों में
जाने क्या सूझा ,
दौड पड़ी
उस जल जैसे आभास को
अंजुरी में भरने ...!!!
जानती थी
नहीं , ये कुछ ओर
है केवल
मन की मरीचिका ..!!
शायद ...
जीवन भी तो
है मात्र...
एक जीजिविषा

-अनन्या अंजू

Saturday, 31 March 2012

साथ तेरे गर वो चल पाया नहीं...... नीरज गोस्वामी

दिल का मेरे ये भी इक फ़ितूर है
मानना हरगिज़ नहीं तू दूर है

मींच कर के आँख फिर से देखिये

हो गया गर ख़्वाब चकनाचूर है

बात में उसकी सदा रहता है सच
जो नहीं मालिक महज मजदूर है

आलमे तन्हाइ का दोज़ख़ है क्या
पूछ उससे जो बहुत मशहूर है

धूल उसने झौंक दी है आखँ में
जिसको समझे थे के इनका नूर है

ग़म खुशी में फ़र्क ही करते नहीं
क्या अजब ये अश्क का दस्तूर है

साथ तेरे गर वो चल पाया नहीं
सोचना नीरज बहुत मजबूर है...... 
------नीरज गोस्वामी

दीप मेरे घर का जलता क्यों नहीं...... ममता किरण

दायरे से वो निकलता क्यों नहीं
ज़िंदगी के साथ चलता क्यों नहीं

बोझ सी लगने लगी है ज़िंदगी

ख़्वाब एक आँखों में पलता क्यों नहीं

कब तलक भागा फिरेगा ख़ुद से वो
साथ आख़िर अपने मिलता क्यों नहीं

गर बने रहना है सत्ता में अभी
गिरगिटों सा रंग बदलता क्यों नहीं

बातें ही करता मिसालों की बहुत
उन मिसालों में वो ढलता क्यों नहीं

ऐ ख़ुदा दुख हो गये जैसे पहाड़
तेरा दिल अब भी पिघलता क्यों नहीं

ओढ़ कर बैठा है क्यूँ खामोशियाँ
बन के लौ फिर से वो जलता क्यों नहीं

क्या हुई है कोई अनहोनी कहीं
दीप मेरे घर का जलता क्यों नहीं...... 
-----ममता किरण

जीवन के लिए जरूरी है............रामेश्वर काम्बोज

थोडी़ - सी छाँव
थोडी़- सी धूप।
थोडी़ - सा प्यार
थोडी़- सा रूप।
जीवन के लिए जरूरी है...

थोडा़ तकरार
थोड़ी मनुहार।
थोड़े -से शूल
अँजुरीभर फूल।
जीवन के लिए जरूरी है...

दो चार आँसू
थोड़ी मुस्कान।
थोड़ी - सा दर्द
थोड़े------- से गान।
जीवन के लिए जरूरी है...

उजली- सी भोर
सतरंगी शाम।
हाथों को काम
तन को आराम।
जीवन के लिए जरूरी है...

आँगन के पार
खुला हो द्वार।
अनाम पदचाप
तनिक इन्तजार।
जीवन के लिए जरूरी है...

निन्दा की धूल
उड़ा रहे मीत।
कभी ­ कभी हार
कभी ­ कभी जीत।........
----रामेश्वर काम्बोज

छोड़ो मेरे दर्दे-ए-दिल की फिक्र तुम.........अधीर


यहॉ कब कौन किसका हुआ है ,
इंसान जरुरत से बंधा हुआ है ।

मेरे ख्वाबो मे ही आते है बस वो,
पाना उसको सपना बना हुआ है।

सुनो,पत्थर दिलो की बस्ती है ये,
तु क्यो मोम सा बना हुआ है ।

खुदगर्ज है लोग इस दुनिया मे,
कौन किसका सहारा हुआ है ।

कहने को तो बस अपना ही है वो,
दिलासा शब्दो का बना हुआ है ।

लोहा होता तो पिघलता शायद,
इंसान पत्थर का बना हुआ है।

जीत ने का ख्वाब देखा नही कभी,
हारने का बहाना एक बना हुआ है ।

नही होता अब यकीन किसी पर भी,
इंसान तो जैसे हवा बना हुआ है।

लगाके गले वो परायो को शायद,
अंजान अपनो से ही बना हुआ है।

छोड़ो मेरे दर्दे-ए-दिल की फिक्र तुम,
ठोकर खाकर "अधीर" संभला हुआ है । 
-अधीर 
प्रस्तुतिकरणः सुरेश पसारी

फूल हों तेरी राह में है मेरी बस दुआ.....रिकी मेहरा

जिन्हें याद करते हैं हम बस यूँ ही सदा
उन्हें मेरी भी चाहत हो ज़रूरी तो नहीं

फ़लसफ़ा मेरी मोहब्बत का मशहूर हो जहाँ

उस महफ़िल में मेरा नाम आए ज़रूरी तो नहीं

सिर्फ़ फूल हों तेरी राह में है मेरी बस दुआ
एक सी हम दोनों की फ़रियाद हो ज़रूरी तो नहीं

तमन्ना दिल में मेरे कई ख़्वाब जगा देती है
मगर किस्मत भी साथ मेरे दे ज़रूरी तो नहीं

मुस्कुरा के भी होते हैं बयाँ हाल इस दिल के
मुझ को रोने की भी आदत हो ज़रूरी तो नहीं
---रिकी मेहरा

Tuesday, 20 March 2012

मैं तो चाँद हूँ तन्हा ही रहा..........हेमज्योत्सना 'दीप'

चेहरे बदलने का हुनर मुझमें नहीं,
दर्द दिल में हो तो हँसने का हुनर मुझमें नहीं,


मैं तो आईना हूँ तुझसे, तुझ जैसी ही बात करूँ,
टूट कर सँवरने का हुनर मुझमें नहीं।

चलते-चलते थम जाने का हुनर मुझमें नहीं,
एक बार मिल कर छोड़ जाने का हुनर मुझमें नहीं,

मैं तो दरिया हूँ, बहता ही रहा,
तूफान से डर जाने का हुनर मुझमें नहीं।

सरहदों में बँट जाने का हुनर मुझमें नहीं,
रोशनी में ना दिख पाने का हुनर मुझमें नहीं,

मैं तो हवा हूँ महकती ही रही,
आशियाने में रह पाने का हुनर मुझमें नहीं।

दर्द सुनकर और सताने का हुनर मुझमें नहीं,
धर्म के नाम पर खून बहाने का हुनर मुझमें नहीं,

मैं तो इन्सान हूँ, इन्सान ही रहूँ,
सब कुछ भूल जाने का हुनर मुझमें नहीं।

अपने दम पे जगमगाने का हुनर मुझमें नहीं,
मैं तो रात को ही दिखूँगा,
दिन में दिख पाने का हुनर मुझमें नहीं,

मैं तो चाँद हूँ तन्हा ही रहा,
तारों की तरह साथ रह पाने का हुनर मुझमें नहीं।

मैं तो जिन्दगी हूँ चलती ही रहूँ,
बेवक्त साथ छोड़ जाने का हुनर मुझमें नहीं।

मैं एक एहसास हूँ, मन में ही बसूँ,
भगवान की तरह पत्थर में रह पाने का हुनर मुझमें नहीं।

-----------हेमज्योत्सना 'दीप'

Saturday, 17 March 2012

मेरे जाने के बाद.............................स्मृति जोशी ''फाल्गुनी''

कुछ मत कहना तुम
मैं जानती हूँ
मेरे जाने के बाद
वह जो तुम्हारी पलकों की कोर पर
रुका हुआ है
चमकीला मोती
टूटकर बिखर जाएगा
गालों पर
और तुम घंटों अपनी खिड़की से
दूर आकाश को निहारोगे
समेटना चाहोगे
पानी के पारदर्शी मोती को,
देर तक बसी रहेगी
तुम्हारी आँखों में
मेरी परेशान छवि
और फिर लिखोगे तुम कोई कविता
फाड़कर फेंक देने के लिए...
जब फेंकोगे उस
उस लिखी-अनलिखी
कविता की पुर्जियाँ,
तब नहीं गिरेगी वह
ऊपर से नीचे जमीन पर
बल्कि गिरेगी
तुम्हारी मन-धरा पर
बनकर काँच की कि‍र्चियाँ...
चुभेगी देर तक तुम्हें
लॉन के गुलमोहर की नर्म पत्तियाँ।
----स्मृति जोशी ''फाल्गुनी''

Thursday, 8 March 2012

अगोरती है आत्मा अगोरती है.............रंजना जायसवाल

प्रेम करना
ईमानदार हो जाना है
यथार्थ से स्वप्न तक ..समष्टि तक
फैल जाना है
त्रिकाल तक
विलीन कर लेना है
त्रिकाल को भी ..प्रेम में.. अपने
जी लेना है अपने
प्रेमालाम्ब में सारी कायनात को पहली बार
प्रेम करना
देखना है खुद को
खोजना है
खुद से
बाहर
मन को छूता है कोई
पहली बार
बज उठती है देह की वीणा
सजग हो उठता है मन –प्राण
चीजों के चर –अचर जीव के ..जन के
मन के करुण स्नेहिल तल तक
छूता है कोई जब पहली बार
सुंदर हो जाती है
हर चीज
आत्मा तक भर उठती है
सुंदरता
अगोरती है आत्मा अगोरती है
देह
देखे कोई नजर
हर पल हमें .
----रंजना जायसवाल

Friday, 2 March 2012

महक उठी थी केसर..........................फाल्गुनी

खिले थे गुलाबी, नीले,
हरे और जामुनी फूल
हर उस जगह
जहाँ छुआ था तुमने मुझे,
महक उठी थी केसर
जहाँ चूमा था तुमने मुझे,
बही थी मेरे भीतर नशीली बयार
जब मुस्कुराए थे तुम,
और भीगी थी मेरे मन की तमन्ना
जब उठकर चल दिए थे तुम,
मैं यादों के भँवर में उड़ रही हूँ
अकेली, किसी पीपल पत्ते की तरह,
तुम आ रहे हो ना
थामने आज ख्वाबों में,
मेरे दिल का उदास कोना
सोना चाहता है, और
मन कहीं खोना चाहता है
तुम्हारे लिए, तुम्हारे बिना।
---------फाल्गुनी

यादों की किरचें ..................................फाल्गुनी

दिल की कोमल धरा पर
धँसी हुई है
तुम्हारी यादों की किरचें
और
रिस रहा है उनसे
बीते वक्त का लहू,
कितना शहद था वह वक्त
जो आज तुम्हारी बेवफाई से
रक्त-सा लग रहा है।
तुम लौटकर आ सकते थे
मगर तुमने चाहा नहीं
मैं आगे बढ़ जाना चाहती थी
मगर ऐसा मुझसे हुआ नहीं।
तुम्हारी यादों की
बहुत बारीक किरचें है
दुखती हैं
पर निकल नहीं पाती
तुमने कहा तो कोशिश भी की।
किरचें दिल से निकलती हैं तो
अँगुलियों में लग जाती है
कहाँ आसान है
इन्हें निकाल पाना
निकल भी गई तो कहाँ जी पाऊँगी
तुम्हारी यादों के बिना।
------फाल्गुनी

Wednesday, 15 February 2012

महफिल में तेरी तुझसे ही लड़ूँगा.....................दिव्येन्द्र कुमार 'रसिक' .

आज मैं अपनी हर बात पे अड़ूँगा,
महफिल में तेरी तुझसे ही लड़ूँगा,

जमाने गुजारे हैं मैने बन्दगी में तेरी,

शान में तेरी न अब कशीदे पढ़ूँगा,

बेदाग समझता है तेरे हुस्न को जमाना,

दोष मेरे सारे अब तेरे सर ही मढ़ूँगा,

जमीं के सफर में ठोकर जो दी है तूने,

साथ मैं तेरे अब न चाँद पे चढ़ूँगा,

थी मेरी तक़दीर पे तेरी ही हुकूमत,

अब आज तेरी किस्मत मैं ही गढ़ूँगा..................
----- दिव्येन्द्र कुमार 'रसिक'

Monday, 13 February 2012

कोई बदलाव की सूरत नहीं थी ..............................सचिन अग्रवाल "तन्हा "


कोई बदलाव की सूरत नहीं थी
बुतों के पास भी फुर्सत नहीं थी ......

अब उनका हक़ है सारे आसमां पर

कभी जिनके सरों पर छत नहीं थी .............

वफ़ा ,चाहत, मुरव्वत सब थे मुझमे
बस इतनी बात थी दौलत नहीं थी ........

फ़क़त प्याले थे जितने क़ीमती थे

शराबों की कोई क़ीमत नहीं थी ..............

मैं अब तक खुद से बेशक़ ख़फ़ा हूँ

मुझे तुमसे कभी नफरत नहीं थी .......

गए हैं पार हम भी आसमां के

वंहा लेकिन कोई जन्नत नहीं थी .........

वंहा झुकना पड़ा फिर आसमां को

ज़मीं को उठने की आदत नहीं थी .............

घरों में जीनतें बिखरी पड़ी हैं

मकानों में कोई औरत नहीं थी ...........

-------सचिन अग्रवाल "तन्हा "

Tuesday, 7 February 2012

मील के पत्थर...............रचनाकार...नामालूम(कृपया बताएं)

ना तो मैं हताश हूँ, ना ही मैं निराश हूँ|
पर अपनी कमरफ्तारी पर, थोड़ा सा उदास हूँ||

कुछ कमी है रौशनी की अभी, रास्ते भी कुछ धुंधले से हैं|

कभी दूर हूँ मैं रास्ते से, तो कभी रास्ते के पास हूँ ||

कर रहा है प्रश्न निरंतर, ये विचारों का अस्पष्ट प्रवाह|

किसी की तलाश में हूँ मैं, या खुद किसी की तलाश हूँ ||

गतिमान है प्रबल संघर्ष, कामनाओं के ज्वार-भाटे से|
इच्छाओं पर अंकुश है मेरा, या कामनाओं का दास हूँ||

चेहरा तो एक ही है मेरा, इन्सान बहुत से हैं अंदर|
कभी कृष्ण की मुरली हूँ, कभी कंस का अट्टहास हूँ||

यूँ तो आम आदमी हूँ, इक आम जिन्दगी जीने वाला|
पर कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके लिये मैं खास हूँ||

माना कि कदम धीमे हैं, पर सफर अभी जारी है|
इसमें कोई आश्चर्य नहीं, कि मील के पत्थर तलाश लूँ||
रचनाकार...नामालूम(कृपया बताएं)

Friday, 3 February 2012

हुआ सवेरा .................................निदा फ़ाज़ली

 हुआ सवेरा
ज़मीन पर फिर अदब
से आकाश
अपने सर को झुका रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
नदी में स्नान करने सूरज
सुनारी मलमल की
पगड़ी बाँधे
सड़क किनारे
खड़ा हुआ मुस्कुरा रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
हवाएँ सर-सब्ज़ डालियों में
दुआओं के गीत गा रही हैं
महकते फूलों की लोरियाँ
सोते रास्तों को जगा रही
घनेरा पीपल,
गली के कोने से हाथ अपने
हिला रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
फ़रिश्ते निकले रोशनी के
हर एक रस्ता चमक रहा है
ये वक़्त वो है
ज़मीं का हर ज़र्रा
माँ के दिल सा धड़क रहा है
पुरानी इक छत पे वक़्त बैठा
कबूतरों को उड़ा रहा है
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं
बच्चे स्कूल जा रहे हैं.....

रचनाकार: निदा फ़ाज़ली

प्रस्तुतिकर्ताः एच. आर.देशमुख

ओ वासंती पवन हमारे घर आना..............डॉ.कुंअर बेचैन

बहुत दिनों के बाद खिड़कियाँ खोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना।

जडे़ हुए थे ताले सारे कमरों में
धूल-भरे थे आले सारे कमरों में ।

उलझन और तनावों के रेशों वाले
पूरे हुए थे जाले सारे कमरों में ।

बहुत दिनों के बाद सँकलें डोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना ।

एक थकन-सी थी नव भाव-तरंगों में
मौन उदासी थी वाचाल उमंगों में

लेकिन आज समर्पण की भाषा वाले
मोहक-मोहक प्यारे-प्यारे रंगों में

बहुत दिनों के बाद खुशबुएँ घोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना ।

पतझर ही पतझर था मन के मधुवन में
गहरा सन्नाटा सा था अन्तर्मन में

लेकिन अब गीतों की स्वच्छ मुंडेरी पर
चिंतन की छत पर भावों के आँगन में

बहुत दिनों के बाद चिरइयाँ बोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना।


-----  डॉ.कुंअर बेचैन

Thursday, 26 January 2012

अच्छा पाठक बनना भी एक कला..............अफ्रीकी लेखक बेन ओकरी की राय

'अच्छा लेखक बनने की पहली शर्त है अच्छा पाठक बनना। लेखन की कला के साथ ही पढ़ने की कला भी विकसित की जानी चाहिए ताकि हम और बुद्धिमत्ता व संपूर्णता के साथ लिखे हुए को ग्रहण कर सकें। मेरे लिए लिखना व पढ़ना दोनों निर्युक्तिदायक प्रक्रियाएं हैं।' ये उद्गार थे अफ्रीकी लेखक बेन ओकरी के।


अंग्रेजी में लिखने वाले बेन ओकरी दुनियाभर के पाठकों के बीच अपनी जगह बना चुके हैं। उनकी रचनाओं का दुनिया की बीस भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। 'द फेमिश्ड रोड' के रचनाकार को अपने बीच पाकर श्रोता मंत्रमुग्ध थे।


खचाखचभरे पांडाल में भी सुई तोड़ सन्नाटे में बैठकर लोगों ने ओकरी की बातों को और उनके रचना पाठ को सुना। उन्होंने अपनी मां के बारे में कविता पढ़ी। मोटे तौर पर शीर्षक का अनुवाद था 'सोती हुई मां'। उनकी पढ़ी एक अन्य कविता का अर्थ है- 'दुनिया में आतंक है तो दुनिया में प्यार भी है। मोहब्बत से भरी है यह दुनिया।'


लेखक ने अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में भी बताया। नाइजीरियाई वाचिक परंपरा व आधुनिक विश्व का संगम अपनी रचनाओं में करने वाले इस लेखक के साथ बातचीत की चंद्रहास चौधरी ने।


एक अन्य सत्र में 'द पावर ऑफ मिथ' यानी मिथकों की शक्ति के बारे में लेखक गुरुचरण दास ने अरशिया सत्तार, जौहर सिरकार व अमिष त्रिपाठी से चर्चा की।


त्रिपाठी की भारतीय पौराणिकता के फॉर्मेट में लिखी दो किताबें 'द इम्मोरटल्स ऑफ मेहुला' व 'द सीक्रेट ऑफ नागास' बहुत चर्चित हुई हैं। इन किताब की प्रतियां लाखों में बिक चुकी हैं। इसे पौराणिक किस्सों के जादुई तिलस्म का प्रतीक मानें या और कुछ, फिलहाल तो पौराणिकता फिर चर्चा में है।


पौराणिक प्रतीकों की शक्ति की चर्चा करते हुए वक्ताओं ने कहा- 'पौराणिक किस्से हमें रस्मों और परंपराओं के रूप में प्रदान किए जाते हैं। इनमें से कुछ हमारे लिए धर्म का हिस्सा भी बन जाते हैं। पर कुल मिलाकर यह सदियों से बहते आए ज्ञान की गंगा बन जाते हैं। पौराणिक किस्से एक ऐसा झूठ है जो सच बताते हैं। इन किस्सों की कल्पना की उड़ान पढ़ने-सुनने का जादू जगाती है। अक्सर इन किस्सों के पात्र पर थीम कालातीत होती है।'


तमिल में लिखने वाली दलित लेखिका बामा फॉस्टीना ने अपने आत्मकथात्मक उपन्यास कारुकू की रचना प्रक्रिया के बारे में बताया। तमिलनाडु के दूर-दूरस्थ गांव में रहते पली-बढ़ी लेखिका ने कहा- कारुकू का मतलब पान की कटीली पत्ती होता है। उनके समुदाय ने वैसा ही जीवन जिया है। बामा के उपन्यास को कई प्रकाशकों ने अस्वीकृत कर दिया था। अंततः एक चेरिटेबल ट्रस्ट ने इसे प्रकाशित किया और पढ़ने पर पाठकों ने इसे सराहा।


इसी सत्र में तमिल लेखक चारू निवेदिता ने भी अपना वक्तव्य रखा। विषय प्रवर्तन किया लेखिका व आयोजन की निदेशक नमिता गोखले ने। शब्द जगत के अलावा सुनहले पर्दे पर साहित्य लिखने वाले भी यहां मौजूद हैं व विभिन्न सत्रों में भागीदारी कर रहे हैं। गुलजार प्रसून जोशी के साथ अपने कहानी सत्र में छाए रहे। इन दोनों को सुनने के लिए दर्शकों में इतनी आतुरता थी कि आयोजकों को वेन्यू बदलना पड़ा। विधुविनोद चोपड़ा, अनुपमा चोपड़ा, संजना कपूर आदि फिल्मी हस्तियां भी हैं। लोग उत्साह और एकाग्रता से विश्लेषण सुन रहे हैं।
प्रस्तुतिः निर्मला भुरा‍ड़‍िया

Tuesday, 24 January 2012

भले हों साथ रातो-दिन सभी हमदम नहीं होते ..................डॉ.महेंद्र अग्रवाल

गरीबों के लिये चावल कभी चमचम नहीं होते
सियासी लोग, ज़ख्मों पर कभी मरहम नहीं होते

मुझे वालिद ने दी ये सीख संगत देखकर मेरी
भले हों साथ रातो-दिन सभी हमदम नहीं होते

सफ़र अपना मुहब्बत का, मुसलसल है हयाते-गम?
बहुत कमजर्फ मिलते है, मेहरबां कम नहीं होते

करार आये मेरे अहसास के टूटे हुए दिल को
तुम्हारी आँख के जाले कभी भी नम नहीं होते

शिकस्तें लाख खाई दोस्तों ने जाल बुन बुनकर
रकीबों कि रही सुहबत कभी बेदम नहीं होते
~डॉ.महेंद्र अग्रवाल

ग़ज़ल कहना मुनासिब है यहीं तक
२९ सदर बाज़ार, शिवपुरी

Friday, 20 January 2012

चेहरा.....................तरुण पन्त

मैने देखा चिंता और प्यार,
झुर्रियों की तह के पीछे,
डबडबाती हुई आँखों में अजीब सी चमक,
और चेहरे पे एक खोखली सी हँसी,

मैले फटे हाथों की लकीरों को देखती हुई आँखें,
जैसे अब भी कुछ होने का इन्तजार है,
फिर देखती हुई पल्लू में पड़ी एक गांठ को,
जैसे जीवन भर की दस्तान उसमें हो,

कुछ यादों की पनाह में,
जैसे एक जिंदगी चल रही है,
वर्तमान के खांचे में,
अतीत की खिड़की खुल रही है,

कुछ सोचते हुए आँखे भर आई उसकी,
जैसे सिलापट पे बिखरी ओस की कुछ बूंदे हो,
डबडबायी आँखों में अब दर्द है,
और चेहरे पे एक जानी पहचानी सी मुस्कान ...


- तरुण पन्त

Thursday, 19 January 2012

चलो दोस्ती की नई रस्म डालें................देवी नागरानी

बहारों का आया है मौसम सुहाना
नये साज़ पर कोई छेड़ो तराना।

ये कलियाँ, ये गुंचे ये रंग और ख़ुशबू
सदा ही महकता रहे आशियाना।

हवा का तरन्नुम बिखेरे है जादू
कोई गीत तुम भी सुनाओ पुराना।

चलो दोस्ती की नई रस्म डालें
हमें याद रखेगा सदियों जमाना।

खुशी बाँटने से बढ़ेगी ज़ियादा
नफ़े का है सौदा इसे मत गँवाना।

मैं देवी ख़ुदा से दुआ माँगती हूँ
बचाना, मुझे चश्मे-बद से बचाना।

---------देवी नागरानी

गंगा की हिफाजत मजहब – ए – हिंद है.......................आलोक तिवारी


विष्णु के पा से ये चरम – ए – सफा हुआ
तीनों जहां की शान में सिवा ईजाफा हुआ ।

गंगा तेरी जबीं पे लिख्खा पयाम – ए – गम
आवाज – ए – दिलखराश पे है चरम – ए – नम ।

गंगा की शोख तबियत से रश्क – ए – अदम हुआ
तेरे लव – ए – जू पे क्यू मजलिस – ए – मातम हुआ ।

सुपुर्द – ए – खाक तुझसे जन्नत का सबब है
गंगा की निगेहबानी में मरना भी गजब है ।

अश्के – हिमाला को आबे – हयात कहा
शक्ल – ए – गंगा में खां कायनात कहा ।

इसरार – ए – भागीरथ तू जहां में नुमूद हुई
तेरे मुकद्दम आब की दुनिया मुरीद हुई ।

काशी में शिव का मस्कन आबे – कश्क है
सदके में शंकर के ये गंगा के अश्क है ।

दमें आखिर गंगेय का लबे – तर किया
मां की ममता का तुने यू इजहार किया ।

मस्लत – ए – अदम ने तुझे तार – तार किया
इस इज्ने – आम ने दिल जार – जार किया ।

संग – ए – दिवार से तुझे महबूस कर रहे
बाखुदा लुटने का काम तेरे मानूस कर रहे ।

रुस्वा किया तुमको तेरे मेहरबान ने
सीना – फिगार किया तेरे मेजबान ने ।

तपीरा – ए – गरल को तूने हिमानी किया
शिव के व्योम – केश को पानी – पानी किया

आबे फिरदौस तु तेरी हस्ती अजीमतर
मल्लिका – ए – जहा तू तेरे नक्श करीमतर ।

गुनाह – ए - बशर को गंगा ने सवाब किया
हमने मुकद्दम आब को जहराब किया ।

गंगा की हिफाजत मजहब – ए – हिंद है
तेरा अंदाज – ए – मोहब्बत मां के मानिंद है ।

मुर्दः रवा किया ‘शौक’ आबे – हयात में
अक्से फना क्यूं दिख रहा परतवे – हयात में ।
------आलोक तिवारी
www.aloktiwari.org

Saturday, 14 January 2012

जानवर...............................के.पी.सक्सेना

क्षणिकाएं

(1)

जानवर की कोख से

जनते न देखा आदमी

आदमी की नस्ल फिर क्यों

जानवर होने लगी।

(2)

गो पालतू है जानवर

पर आप चौकन्ने रहें

क्या पता किस वक़्त वो

इन्सान बनना ठान ले।

(3)

पड़ोसी मर गया, अब यह खबर अखबार देते हैं

सोच लो किस तर्ज़ में हम ज़िन्दगी का बोझ ढोते हैं,

अब तो मैं भी छोड़ता बिस्तर सुनो तस्दीक़ कर,

नाम मेरा तो नहीं था कल ’निधन’ के पृष्ठ पर।


------के. पी. सक्सेना

Friday, 13 January 2012

आँख मूँद देखा मैंने सूर्य समाया नयनों में आज......डॉ. दीप्ति गुप्ता

एक विलक्षण अनुभूति
सृष्टि नजर आ रही
अनोखी-अनूठी............!
निरभ्र, स्वच्छ, उजला आकाश
सूर्य समाया नयनों में आज....

आज इच्छित, आराधित पूजित,
प्रार्थित पूर्ण जीवन की अभिलाष
सूर्य समाया नयनों में आज....

पुष्प, पल्लव, झरता निर्झर,
पुलकित करता मन को आज
मंद-मंद, सुगन्ध बयार कहता
जीवन परिवर्तित आज
सूर्य समाया नयनों में आज......

कल-कल करता सरिता का जल
कितना चंचल, कितना शीतल
धवल कौमुदी कर सम्मोहित
चहुँ दिशि रचती एक इन्द्रजाल
सूर्य समाया नयनों में आज.....

एक कामना मन में आती
होए भविष्य वर्तमान का साथी
शाश्वत, मधुर, मदिर आभास
पतझड बना बसन्त बहार
सूर्य समाया नयनों में आज.....

तमापूरित, मलिन, अशुचितम
कण-कण लघु जीवन के क्षण
सहसा बने नवल उल्लास
हुआ इन्द्रधनुष सुन्दर साकार
सूर्य समाया नयनों में आज ...

विधि ने रचा स्वर्ग धरती पर
कितना सुन्दर, कितना अभिनव
सार्थक है - ‘तत् त्वमसि’ आज
वृक्षों से झड़ते पुहुप लाज
सूर्य समाया नयनों में आज...

आँख मूँद देखा मैंने
अन्तरतम में मधुर उजास
सत्य, शिव, सुन्दर का बन्धन धोता
कलुष, मिटा अवसाद
सूर्य समाया नयनों में आज...

नहीं चकित होऊँगी
यदि- कहे इसे कोई सपना
सपना ही सही,
लेकिन है तो मेरा अपना !

---डॉ. दीप्ति गुप्ता

चाहा था उन्हें .........अपना बनाना .................दीप्ति शर्मा

कसूर इतना था कि  चाहा था उन्हें

दिल में बसाया था उन्हें कि

मुश्किल में साथ निभायेगें

ऐसा साथी माना था उन्हें |

राहों में मेरे साथ चले जो

दुनिया से जुदा जाना था उन्हें

बिताती हर लम्हा उनके साथ

यूँ करीब पाना चाहा था उन्हें

किस तरह इन आँखों ने

दिल कि सुन सदा के लिए

उस खुदा से माँगा था उन्हें

इसी तरह मैंने खामोश रह

अपना बनाना चाहा था उन्हें |



-  दीप्ति शर्मा

Thursday, 12 January 2012

पीड़ा..........एक मूक रुदन............................चांदी दत्त शुक्ला

तुम्हारा दोस्त दुखी है...
उससे न पूछना, उसकी कातरता की वज़ह,
दुख की गंध सूखी हुई आंख में पड़ी लाल लकीरों में होती है।
ये सवाल न करना, तुम क्यों रोए?
कोई, कभी, ठीक-ठीक नहीं बता सकता अपनी पीड़ा का कारण।
दर्द की कोई भाषा नहीं होती।
कहानियों के ब्योरों में नहीं बयान होते हताशा के अध्याय,
न ही दिल के जख्मों को बार-बार ताज़ा चमड़ी उधेड़कर दिखाना मुमकिन होता है साथी।
कोई कैसे बताएगा कि वह क्यों रोया?
इतना ही क्यों, इस बार ही क्यों, इतनी छोटी-सी वज़ह पर,
ऐसे सवाल उसे चुभते हैं।
मत रो पड़ना उसे हताश देखकर,
वह घिर जाएगा ग्लानि में और उम्र भर के लिए।
नैराश्य होगा ही उसकी ज़ुबान पर और लड़खड़ा जाएगी जीभ,
बहुत उदास और अधीर होगा, अगर उसे सुनानी पड़ी अपनी पीड़ा की कथा।
तब भी यकीन करो, शब्दों में नहीं बांध पाएगा वह अपनी कमज़ोरी।
हो सके तो उसे छूना भी नहीं।
तुम्हारी निगाह में एक भरोसे का भाव है उसका सबसे कारगर मरहम,
उसमें बस लिखा रहे ये कहना – तुम अकेले नहीं हो।
उसकी भीगी पलकों को सूखने का वक्त देना
और ये कभी संभव नहीं होगा, उसे यह समझाते हुए –
गलतियां ये की थीं, इसलिए ऐसा हुआ!
हर दुखी आदमी मन में बांचता है अपने अपराध।
वह जड़ नहीं होता, नहीं तो रोया ही न होता।
दुख नए फैशन का छीटदार बुशर्ट नहीं है कि वह बता सके उसे ओढ़ने की वज़ह,
कोई मौसम भी नहीं आता रुला देने में जो हो कारगर।
हर बार आंख भी नहीं भीग जाती दुख में।
जब कोई खिलखिलाता हुआ चुप हो जाए यकायक,
तब समझना, कहीं गहरे तक गड़ी है एक कील,
जिसे छूने से भी चटख जाएंगी दिल की नसें।
उसके चेहरे पर पीड़ा दिखनी भी जरूरी नहीं है।
एक आहत चुप्पी, रुदन और क्षोभ की त्रासदी की गवाही है।
उसे समझना और मौजूद रहना,
बिना कुछ कहे,
क्योंकि पीड़ा की कोई भाषा नहीं होती।
------चांदी दत्त शुक्ला

Wednesday, 11 January 2012

मैं रुक गयी होती............................."दीप्ति शर्मा "

जब मैं चली थी तो
तुने रोका नहीं वरना
मैं रुक गयी होती |
यादें साथ थी और
कुछ बातें याद थी 
ख़ुशबू जो आयी होती
तेरे पास आने की तो
मैं रुक गयी होती |
सर पर इल्ज़ाम और
अश्कों का ज़खीरा ले
मुझे जाना तो पड़ा
बेकसूर समझा होता तो
मैं रुक गयी होती |
तेरे गुरुर से पनपी 
इल्तज़ा ले गयी
मुझे तुझसे इतना दूर
उस वक़्त जो तुने 
नज़रें मिलायी होती तो
मैं रुक गयी होती |
खफा थी मैं तुझसे 
या तू ज़ुदा था मुझसे
उन खार भरी राह में
तुने रोका होता तो शायद 
मैं रुक गयी होती |
बस हाथ बढाया होता 
मुझे अपना बनाया होता 
दो घड़ी रुक बातें 
जो की होती तुमने तो 
ठहर जाते ये कदम और 
मैं रुक गयी होती |
------ "दीप्ति शर्मा "

यादें .................आलोक तिवारी


एकाएक बंद हो गई
उन कदमो की आवाज़
आना
हम होते जिनके
अभ्यस्त |

अख़बार यूँ ही
रह जाते बिन
पलटाये
खाली ही रह जाती
वर्ग पहेली |

अलसुबह चाय ले जाते
हुए ठिठक गया
सूनी आराम कुर्सी देखकर
वो , जो मुददतो पहले
चले गए
पर उनकी याद में
आ गए
आँखों में ताजा गर्म आंसू|

चश्मे की गर्माहट
महसूस की थी कई बार
जब तुरंत उतरे चश्मे को
हाथो में लिया था
अब ठण्डा है|

अनायास नाम बदल गया
पता वही है
चिठ्ठियाँ आती है
मेरे नाम से
उनका नाम न होने से
हर बार कुछ और
टूट जाता हूँ मै |

पौधो की रंगत
उड़ चुकी है
बेरंग पौधे में
बेमन से खिले हुए है
कुछ फुल
वो ढूंढ़ते है
उन हाथों की
ऊष्मा |

कमरे से कोई नहीं
देता आवाज
न देर से आने की
वजह पूछता है
चुपचाप गुजर जाता हू मै
अपने कमरे तक |

उम्रदराज लोग
याद करके सुनाते
कुछ अनसुने किस्से
माँ के जाने के बाद
किस कदर टूट चुके थे
मुझको लेकर
फिक्रमंद थे
पिता के दोस्त
जो आखरी कुछ
गवाह है
जिन्होंने देखा
मेरा और पिता का प्रेम
एक दूसरे के प्रति |
--आलोक तिवारी

**ताले **...............मनोज गुप्ता

प्यार किया है मैंने,
उन लोंगो से ,जिनके जीवन में
बाहर निकलने के रास्ते में ,
कहीं न कहीं पड़े है छोटे बड़े ताले !

पास रह के भी नहीं खुलते ,
अपनाने पड़ते हैं टेढ़े मेढ़े रास्ते !
पाप बताते , नरक रचते हैं
ये मन के बेवजह ताले !

सोने चांदी और लोहे ,
के ताले जिनमें बंद हैं ,
खुशियों की खिलखिलाहट
और रौशनी के झरने !

वह अनुभूति की दिव्यता ,
जिसे सर झुका के
हम मान लेते है
स्वीकारोक्ति से भर जाते हैं !

तालों के खुलने से ,
खुल जाती है नई दुनियां ,
सूरज के सामने आ जाते हैं
देखते हैं नई चीजें ,पुराने सरोकारों में !

अंकुरण से फल फूल तक ,
वसंत से पतझड़ तक
समझ में आता है जीवन ,
बहती हुई जीवन सरिता !

पल पल , हर पल
बदलता है जीवन जहाँ ॥
हमने क्यों लगा रखें हैं ,
अनगिनत ताले वहाँ ॥
----मनोज गुप्ता

Tuesday, 10 January 2012

जो जागा...........................गुलाब कोठारी

गलतियों का
पुतला है
आदमी।
भोलेपन में,
प्रवाह में,
आवेश में,
नादानी में,
हो सकती हैं
गलतियां।
क्या जरू री है
हर गलती का
लाभ उठाता रहे
जमाना,
कोई तो मिले
जो रोक सके
हाथों को
गलती करते समय
कोई तो दिखाए रास्ता
जीवन की सच्चाई का।
जब हाथ उठता है
गलती करने को
मन छूट जाता है
पकड़ से
तब वहां
उस माहौल में
कौन मिलेगा मनीषी
खोजता हुआ
अपने ईश्वर को
और, जो जागा,
मनीषी हो जाएगा।
--------गुलाब कोठारी
gulabkothari.wordpress.com

Sunday, 8 January 2012

बेगानों की बेगानी बातें..............सुनन्दा

फासले तुम जो बढ़ाने लगे,
हम खुद के करीब आने लगे.
एक पल न लगा छोड़ कर जानें में,
पास आने में तो जमाने लगे.
एक पल जिन्हें बिताने में उम्र लगी,
गुजर गए वो फसाने लगे.
हिचकी मौत की जो आने लगी,
फिर से जीने के ये बहाने लगे.
तोड़ते रहे दिल कदम-दर कदम,
मुझको वो दोस्त कुछ पुराने लगे.
मुद्दतों दिल में बसाया जिनको,
आज वो ही सबसे बेगाने लगे
------सुनन्दा

Saturday, 7 January 2012

फ़ुज़ूल काम हमारे यहाँ नहीं होते !!....................................मयंक अवस्थी

अगर हवाओं के रुख, मेहरबाँ नहीं होते
तो बुझती आग के तेवर, जवाँ नहीं होते

दिलों पे बर्फ जमीं है, लबों पे सहरा है
कहीं खुलूस के झरने, रवाँ नहीं होते

हम इस ज़मीन को, अश्कों से सब्ज़ करते हैं
ये वो चमन है ,जहाँ बागबाँ नहीं होते

कहाँ नहीं हैं, हमारे भी ख़ैरख्वाह,मगर
जहाँ गुहार लगाओ वहाँ नहीं होते

वफा का ज़िक्र चलाया तो, हंस के बोले वो

फ़ुज़ूल काम हमारे यहाँ नहीं होते !! 
--------मयंक अवस्थी 
प्रस्तुतिकरणः सुरेश पसारी