तुम देना साथ मेरा

तुम देना साथ मेरा

Wednesday, 14 February 2018

ना होती स्त्री मैं तो


सीमित हूँ 
बहुत.....मैं
शब्दों में....
अपने ही
लेकिन, हूँ
विस्तृत बहुत
अर्थों में..... मेरे
अपने ही...
ना होती स्त्री 
मैं  तो...कहो
कहाँ होता...अस्तित्व 
तुम्हारा.........भी
मेरे होने से.... ही
तुम पुरुष हो....वरना 
व्यर्थ है... 
तुम्हारा...यह 
व्यक्तित्व....
-मन की उपज

Monday, 29 January 2018

हो रहे पात पीत


हो रहे 
पात पीत
सिकुड़ी सी 
रात रीत
ठिठुरन भी 
गई बीत
गा रहे सब
बसंत गीत
भरी है
मादकता
तन-मन-उपवन मे.
समय होता 
यहीं व्यतीत
बौराया मन
बौरा गया तन
और बौराई
टेसू-पलाश
गीत-गात में 
भर गई प्रीत
-मन की उपज

Tuesday, 9 January 2018

जलता रहता है अलाव एक


जाने के बाद
तुम्हारे
अक्सर
ख़्यालों में 
तुमसे मिलकर
लौटने के बाद
हल्की-हल्की
आँच पर
खदबदाता रहता है
तुम्हारा एहसास 
लिपट कर साँसों से
पिघलता रहता है
कतरा-कतरा।
बनाने लगती हूँ
कविता तुम्हारे लिए
अकेलेपन की.......
जलता रहता है
अलाव एक
बुझते शरारों के बीच
फिर उम्मीद जगती है
और एक मुलाकात की
फिर.....तुम्हारे लिए
तुमसे मिलूँ.....
एक और नई
कविता के लिए

-यशोदा
-मन की उपज

Wednesday, 3 January 2018

आनन्द प्रेम का...



आनन्द
प्रेम का...
असम्भव है 
शब्दों में 
बता पाना
और ये भी कि 
क्या है प्रेम का
कारण... 
यह गूंगे का गुड़ है 
देह, मन, आत्मा का 
ऐसा आस्वाद है 
जिसके विवेचन में
असमर्थ हो जाती
इंद्रियां भी...
अलसा जाती हैं....
आस्वाद प्रेम का 
अनुभव तो करती हैं 
पर उसी रूप में
नहीं कर पाती
व्यक्त 
यही कारण है कि 
आज भी प्रेम 
अपरिभाषित है, 
नव्य है....
काम्य है....
ऐसा कौन सा
जीव होगा...
जो अछूता है
जादू नहीं चला
अबोध हो या
सुबोध हो 
अज्ञ, तज्ञ या विज्ञ
भी समझते हैं
आभा प्रेम की
स्पर्श प्रेम का
देह, मन और आत्मा को 
छू लेता है.... 
पेड़-पौधे तक 
इस स्पर्श को 
समझते हैं....
सृष्टि का आधार
प्रेम ही तो है....और
ये सृष्टि भी...
उसी का सृजन है
कहने को तो
अक्षर ढाई ही हैं
पर है तो..अब तक
अपरिभाषित...

-यशोदा
मन की उपज

Wednesday, 27 December 2017

ना जाने कितने मौसम बदलेंगे.....


ना जाने कितने मौसम बदलेंगे
ना जाने
कितने लोगों से
कितनी
मुलाकातें बची है?
न जाने कितने दिन
कितनी रातें बची हैं?
ना जाने कितना रोना
कितना सहना बचा है?
कब बंद हो जायेंगी आँखें
किस को पता है?

कितने फूल खिलेंगे?
कब उजड़ेगा बागीचा
किस को पता है?
ना जाने कितनी सौगातें
मिलेंगी?
बहलायेंगी या रुलायेंगी
किस को पता है?
जब तक जी रहा
क्यों फ़िक्र करता निरंतर
ना तो परवाह कर
ना तू सोच इतना
जब जो होना है हो
जाएगा
जो मिलना है मिल
जाएगा
तू तो हँसते जा गाते जा
निरंतर
जो भी मिले
उससे गले लग कर
मिल निरंतर...!!
-यशोदा
मन की उपज

Sunday, 17 December 2017

फिर अंकुरित हो जाती है

पत्ते झड़ते रहते हैं
शाखाएँ भी कभी
टूट जाती है
पर वृक्ष...
खड़ा रहता है
निर्विकार..निरन्तर
उस पर 
नई शाखाएँ 
आ जाती है
नवपल्लव भी
दिखाई पड़ने लगती है
कुछ जिद्दी लताएँ
साथ ही नही छोड़ती 
वृक्ष का..
रहती है चिपकी
सूखती है और फिर
अंकुरित हो जाती है
-यशोदा
मन की उपज

Thursday, 14 December 2017

एक और शाम....



एक और शाम
उतर आयी आँखों में
भर गयी नम किरणें
खुला यादों का पिटारा...
भीग गयी पलकें
फैलकर उदासी 
धुंधला गयी चाँद को 
झोंका सर्द हवा का
लिपटकर तन से
छू गया अनछुआ मन
ठंडी हथेलियों को चूम
चाँदनी महक गयी 
ओढ़ यादों की गरमाहट
लब मुस्कुराये
जैसे हो स्नेहिल स्पर्श तुम्हारा
- यशोदा
मन की उपज